Wednesday, December 18, 2013

दर्द भरी शायरी

शीशे के खिलौनों से खेला नहीं जाता

रेतों के घरौंदों को तोड़ा नहीं जाता


आहिस्ते से आती हवा को कैसे कहूँ मैं


कि बेशरमी से बदन को छुआ नहीं जाता


जलते हुए दिलों की निशानी जो दे गया


कुछ ऐसे चिरागों को बुझाया नहीं जाता


बनती हुई तस्वीर तेरी चाँद बन गई


अब मेरे तसव्वुर का उजाला नहीं जाता




2 comments:

  1. आप की रचना बहुत प्यारी है

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